बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

हिंदी हमारी शान है



हिन्दी भारत और विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। उसकी जड़ें प्राचीन भारत की संस्कृत भाषा में तलाशी जा सकती हैं। 
पूर्व में हिंदी की शुद्धता पर लोग बचपन से ध्यान देते थे, पर धीरे-धीरे अंग्रेजी  विशेष ध्यान दिया जाने लगा  … भाषा का ज्ञान अति आवश्यक है, पर अपनी भाषा में शून्य हो जाना दुःख की बात है। आज भी हिंदी को सही मायनों में अर्थ देनेवाले लोग हैं, लेकिन लोग पढ़ना नहीं चाहते - लगता है पढ़ने से हार हो जाएगी।  यदि रूचि है तो हार का प्रश्न कहाँ है  … 
यह ब्लॉग एक परिचय है, - उनलोगों का जो हिंदी, हिंदी साहित्य को जीते हैं, ज़िंदा रखना चाहते हैं -


मातृभाषा का सम्मान करें …………


नील निलय ,
नीलाम्बर निशांत  ,
निशि की  नीरवता सुशांत ,


अरुषि   की लालिमा में परिवर्तित हुई ,
भोर भई ,

प्रकाश का प्रस्फुटन हुआ ,
प्रभा  पंख पसार रही ,
दृष्टिगोचर होते सप्त रंग ,
विस्तृत नभ पर विस्तार हुआ ,
श्रवण श्रुति मुखर  हुई,

मन परिधि पर छिटक रहा ,
सप्त रंगों का इन्द्रधनुष ,
कूची में भर लिए रंग ,
मिट गया ह्रदय कलुष ,
आओ चलो चलें……… छेड़ें रागिनी कोई ,
गायें मंगलगान ,
कुछ रंग भरें ,
कोई  गीत रचें,कुछ गीत लिखें ,
नहीं बैर कहीं ,बस प्रीत लिखें ,
हिन्द देश के निवासी हम  …………….
हिंदी का गुणगान करें   …………………
लिखें ,रचें,कुछ ऐसा………………
आओ मातृभाषा का  सम्मान करें…………


आगे बढ़ा


नव खोज सा प्रतीत होता मुझको मेरा कारवां,

चक्षु प्रकाशित, ह्रदय उत्साहित, मुदित मन आगे बढ़ा,
कण-कण समेटे राह में रख पद कमल आगे बढ़ा...

रात सितारों ने झिलमिला कर थी नई जो राह सुझायी,
उस ही पथ, सर पर मुकुट, पुष्प-माल गल आगे बढ़ा...

चाप मथ सिन्दूर गढ़, ध्वज लाल संग आगे बढ़ा,
नभ तक पहुँच, रुक कर क्षणिक फिर ले विदा आगे बढ़ा...

पवन रथ पर हो सवार, काट घन आगे बढ़ा,
पहुँच प्रकाश नगरी जहाँ उन्मुक्त बह रही गगन गंगा,
लगा डूबकी, अमृतव चख, फिर प्रफूलित मन आगे बढ़ा...

अतुलित प्रसन्नचित, होम कर व्यथा, अनुराग सब मोह सुख,
बेराग के अंगोछे में कर हवन दुःख आगे बढ़ा...

अश्रु श्राद्ध कर, तार स्वयं को, नव प्रभात सन्मुख चला,
चक्षु प्रकाशित, ह्रदय उत्साहित, मुदित मन आगे बढ़ा...  

3 टिप्‍पणियां:

  1. यह ब्लॉग एक परिचय है, - उनलोगों का जो हिंदी, हिंदी साहित्य को जीते हैं, ज़िंदा रखना चाहते हैं -
    गौरवान्वित हूँ पढ़ कर !!

    आभार रश्मि दी !!सुंदर शीर्षक और सारगर्भित रचनाओं के बीच अपनी रचना पढ़ना बहुत सुखद होता है !!आपका हृदय से आभार !!आपकी दृष्टि सब कुछ समेट लेती है !!

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  2. बहुत सुन्दर रचनाएँ ,मन परिधि पर छिटक रहा ,
    सप्त रंगों का इन्द्रधनुष ,
    कूची में भर लिए रंग ,
    मिट गया ह्रदय कलुष ,मंजुल भटनागर .

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